महावीर स्वामी
• जैन धर्म के वास्तविक संस्थापक महावीर स्वामी थे।
• जन्म -वैशाली के निकट कुंडग्राम में हुआ।
• पिता- सिद्धार्थ (ज्ञातृक कुल के मुखिया थे)
• माता- त्रिशला( लिच्छवी गणराज्य प्रमुख चेटक की बहन थी)
• बचपन का नाम- वर्द्धमान
• पत्नी - यशोदा
• पुत्री - प्रियदर्शना
• महावीर ने 30 वर्ष की अवस्था में बड़े भाई नंदिवर्द्धन की आज्ञा लेकर गृह त्याग कर दिया।
• 12 वर्ष की कठोर तपस्या के पश्चात् जृम्भिक ग्राम (साल वृक्ष के नीचे) के समीप ऋजुपालिका नदी के तट पर वर्द्धमान को कैवल्य प्राप्त हुआ।
• कैवल्य प्राप्त होने के पश्चात् ये केवलिन, इन्द्रियों को जीत लेने के कारण जितेन्द्रिय तथा अतुल पराक्रम दिखाने के कारण ये महावीर कहलाए।
• 72 वर्ष की उम्र में राजगृह के निकट पावापुरी (मल्ल राज्य) में 468 ई. पू. में निर्वाण प्राप्त किया।
• महावीर की मृत्यु के बाद केवल एक गणधर सुधर्मन जीवित बचा, जो जैन संघ का उनके बाद प्रथम अध्यक्ष बना।
• जैन मठों को दक्षिण भारत में बसादि के नाम से जाना गया है।
• जैन धर्म की शिक्षाएँ :-
• जैन साहित्य प्राकृत (अर्द्धमागधी) भाषा में लिखा गया।
• जैन साहित्य को आगम कहा जाता है जिसमें 12 अंग, 12 उपांग, प्रकीर्ण, छन्दसूत्र आदि सम्मिलित हैं।
• पार्श्वनाथ ने भिक्षुओं के लिए चार व्रतों का विधान किया था, अहिंसा, सत्य, अस्तेय तथा अपरिग्रह।
• महावीर स्वामी ने ब्रह्मचर्य को जोड़कर पंचमहाव्रत धर्म का प्रतिपादन किया।
• सृष्टिकर्ता के रूप में ईश्वर को नहीं मानना। (अनीश्वरवादी)
• देवताओं के अस्तित्व को स्वीकार किया है परन्तु इनका स्थान 'जिन' से नीचे है।
• जैन धर्म कर्मवादी है तथा इसमें पुनर्जन्म की मान्यता है।
• त्रिरत्न:
• सम्यक् दर्शन - सत में विश्वास।
• सम्यक् ज्ञान - वास्तविक ज्ञान।
• सम्यक् आचरण - सांसारिक विषयों में उत्पन्न सुख -दु:ख के प्रति समभाव।
• निर्वाण : आत्मा को कर्मों के बंधन से छुटकारा दिलाना 'निर्वाण' कहा गया है।
• अनन्त चतुष्टय की अवधारणा जैन धर्म से सम्बन्धित है।
• “शलाका पुरुष” अवधारणा का संबंध जैन धर्म से है।
• जैन धर्म में ज्ञान प्राप्ति के तीन स्रोत माने गए हैं :-प्रत्यक्ष, अनुमान तथा तीर्थंकरों के वचन
• जैन धर्म में विद्रोह जमालि व तीसगुप्त ने किया था।
• जमालि महावीर के प्रथम शिष्य तथा उनकी पुत्री प्रियदर्शना के पति थे।
• महावीर ने अपना प्रथम उपदेश राजगृह की विपुलाचल की पहाड़ी पर दिया।
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