कर्नल गुरबक्श सिंह ढिल्लों
आजाद हिंद फौज के वीर सिपाही कर्नल गुरबक्श सिंह ढिल्लों का जन्म 18 मार्च, 1914 को तत्कालीन लाहौर जिले में हुआ था। कर्नल जी.एस. ढिल्लों ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा लाहौर से पूरी की।
वे डॉक्टर बनना चाहते थे परंतु कतिपय कारणों से वह भारतीय सेना में वर्ष 1940 में कमीशन अधिकारी के रूप में शामिल हो गए।
द्वितीय विश्वयुद्ध में भारतीय अंग्रेजी फौजों की तरफ से लड़ते हुए उन्हें जापानी सेना के समक्ष आत्म-समर्पण करना पड़ा।
सुभाषचंद्र बोस ने जब आजाद हिंद फौज का गठन किया, तो वे आजाद हिंद फौज में शामिल हो गए और सुभाष चंद्रबोस ने इन्हें नेहरू ब्रिगेड के चैथी गोरिल्ला रेजीमेंट का प्रभार सौंपा।
आजाद हिंद फौज की तरफ से लड़ते हुए इन्होंने ब्रिटिश सेना का बड़ा वीरता पूर्वक सामना किया परंतु वे ब्रिटिश सैनिकों द्वारा बंदी बना लिए गए और प्रेम कुमार सहगल और शाहनवाज खान के साथ दिल्ली भेज दिए गए।
दिल्ली के लालकिले में उन पर कोर्ट मार्शल किया गया और मुकदमा चलाया गया।
भूलाभाई देसाई के नेतृत्व में पंडित नेहरू ने भी इनके मुकदमे की पैरवी की परंतु उन्हें फाँसी की सजा सुनाई गई।
कालांतर में जन-दबाव के कारण इन्हें छोड़ दिया गया अपने जीवन के उत्तरार्द्ध में इन्होंने शिवपुरी के हातौदी में अपना स्थाई निवास बना लिया।
शिवपुरी की भूमि को आवास हेतु चुनने के कारण का बहुत ही बढ़िया वर्णन उन्होंने अपनी आत्मकथा ‘फ्रॉम माय बोन्स‘ में किया है।
वर्ष 1998 में तत्कालीन राष्ट्रपति के. आर. नारायणन द्वारा इन्हें ‘पद्म भूषण’ की उपाधि से सम्मानित किया गया।
शिवपुरी में निवास करते हुए दिनांक 6 फरवरी, 2006 को इनका देहान्त हो गया।
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